अध्याय:- 10 पुरानी व्याख्या

unexpectedstories.in इस दौरान डॉ. निवासन ने विशेष कारण से गुप्त रखे गए इक स्थान में प्रवेश किया। काँच की एक दिवार से बने कमरे को सावधानी से छुपाया गया था। वे अपने साथ ओम के लॉकर में पाई गई पुस्तक लाए थे। उन्होंने वह पुस्तक एक बूढ़े व्यक्ति को सौंप दी। वृद्ध आदमी ने जैसे ही पुस्तक को लिया, उसकी आँखें उत्साह से चमक उठी और वह पुस्तक के पन्ने पलटने लगा; परंतु शीध्र ही वह प्रसन्नता क्रोध में बदल गई। लंबी चुप्पी के बाद आदमी ने काँपती-सी आवाज में कहा, “पुस्तक का दूसरा भाग कहाँ है ? “

डॉ. निवासन परेशान और भयभीत खड़े थे। उन्होंने सोचा था की पुस्तक पूरी है, जबकि सुविधा केंद्र के किसी भी सदस्य के लिए अबूझ भाषा, अजीब रेखाचित्र, नक्शा और पौधो के होने से वह आसानी से समझ में आने वाली नहीं थी। इससे पहले की वे ये सब उस आदमी से कह पाते, वह आदमी क्रोध से सिखाते हुए बोले, “मैंने कहा, पुस्तक का दूसरा भाग कहाँ है?”

डॉ. निवासन ने तेजी से जवाब दिया, “मुझे नहीं पता, सर। हमे लॉकर से केवल यही पुस्तक मिली है।” वह बहुत बुरी तरह से दर गए थे।

बूढ़े आदमी ने धीरे से अपनी ऊँगली के इशारे से डॉ. निवासन को अपने पास बुलाया। डॉ. निवासन ने आदेश का पालन किया और आदमी की पुरानी व् घिसी जीर्ण कुर्सी के निकट फर्श पर घुटनो के बल झुके। बूढ़े आदमी ने निवासन के बालो को जकड़ा और बड़ी भयानकता से घूरते हुए कहा, “इसे देखो, पढ़ो इसे, अनपढ़ ! इस पुस्तक का हर दूसरा पन्ना गायब है। ” उसने पुस्तक को डॉ. निवासन के मुँह पर फेकते हुए कहा, “सम संख्या वाले सभी पृष्ठ क्या है और विषम संख्या वाले पृष्ठ दूसरी पुस्तक में है। यह एक चाल है, जिससे पुस्तक एक-दूसरे के बिना बेकार है। दूसरी पुस्तक अब कहाँ है ?” unexpectedstories.in

डॉ. निवासन पन्नो पर नंबर नहीं देख सके, फिर भी जल्दी से गलती स्वीकारते हुए बोले, “हम यही सब ला पाए, सर। डॉ. बत्रा ने जैसे ही इस पुस्तक को देखा, वे समझ गए थे। “

बूढ़े आदमी ने घृणा के साथ जवाब दिया, “उसे डी.एन.ए. के रेखाचित्र और उनसे निकले जींस को देखने के बाद समझ में आया। भले ही वह भाषा समझकर पड़ने में सफल हो जाए, वह चीजे समझ सकता है, पर इस पुस्तक से कुछ निष्कर्ष नहीं निकाल सकता। इस पुस्तक से कोई भी किसी परिणाम पर नहीं पहुँच सकता, क्योकि यह पूरी नाही है। तुम्हे लॉकर में और क्या मिला?”

“सर, हमे मिली हर चीज आपकी व्यक्तिगत प्रयोगशाला में भेज दी गई है, एक नक़्शे को छोड़कर, जिसे मैंने एल.एस.डी. को सुलझाने के लिए दिया है। ” डॉ. निवासन ने शुष्क गले के साथ कहा।

नक़्शे के जिक्र मात्र से बूढ़े आदमी की आँखों में चमक आ गई।

“नक्शा ? वह नक्शा ही दूसरी पुस्तक की चाबी है। उसे सुलझाने में कितना समय लगेगा ? ” उसने बेरुखी से पूछा।

“मुझे नहीं पता, सर।”

“तो उससे पूछो और मुझे अभी बताओ।”

“ठीक है, सर।”

डॉ. निवासन भयभीत व् अपमानित महसूस करते हुए तेजी से कमरे से बाहर चले गए।

द्वीप के जंगल में दूर, दूसरा व्यक्ति उसी तरह का मुखौटा चेहरे पर लगाए, हाथ में एक प्राचीन चाबी लिये पहले वाले व्यक्ति के साथ आ गया। वे जिस इमारत पर नजर रख रहे थे, उस पर घावा बोलने ही वाले थे। दोनों ने अपनी घडियो को एक ही समय पर सेट किया और उनमे से एक ने दूसरे को इमारत के अंदर का भाग, इधर से उधर जाते लाल बिंदु, प्रवेश द्वार पर लगे संकेतक दिखाए, जिनसे उन्हें इमारत के अंदर घुसने के लिए भिड़ना था। उन्होंने बिना कुछ बोले तय किया की एक समान स्थान, जो की इमारत के अंदर एक दरवाजा है, पर मिलने से पहले प्रत्येक व्यक्ति कितने लोगो को मार गिरायेगा।

वही पूछताछ कक्ष में ओम जैसे ही डॉ. शाइना के प्रशन का उत्तर देने वाला था, एल.एस.डी. अपने दोनों हाथ ऊपर हवा में फेकते हुए ख़ुशी से चिल्लाई जैसे वह अपने आपको अघोषित मैराथन में विजयी घोषित कर रही हो ! सुरक्षा कर्मियों ने चौंकते हुए सतर्कता से साथ अपनी बंदूके उसकी ओर तान दी। सभी ने आपने सिर उसकी ओर घुमाए और डॉ. निवासन को देखा, उसके भाव बदल गए। अचानक ही उसे एक विजेता नहीं, बल्कि एक छोटी बच्ची की तरह महसूस हुआ, जिसने अपनी माँ का मनपसंद फूलदान तोड़ दिया हो। उसने डॉ. निवासन की ओर आंतकित व् क्षमा-याचक नज़रो से देखा । वह इतनी दरी हुई थी की उसकी आँखों में आँसू आ गए।

डॉ. शाइना उसे आशवस्त करने के लिए उठी, पर डॉ. निवासन ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया।

वे एल.एस.डी. के पास गए और उसका हाथ पकड़कर कमरे से बाहर ले गए।

दरवाजा पार करते ही उन्होंने पूछा, “तुम क्यों चिल्लाई ? “

“क्योकि मैंने आपके दिए नक़्शे को सुलझा लिया, सर ! “

“बहुत अच्छे ! मैं उसी के लिए तुम्हारे पास आ रहा था। वह कहाँ है ? “

“सर, उन्होंने नक़्शे में जान-भूझकर स्थानों के अक्षांश और देशांतर आपस में बदल दिए है। उनके ऊपर की डिग्री व् दशमलव को आपस में बदला गया है; जलाशय को भूमि को जलाशय में बदल दिया गया है, ताकि स्थान को आसानी से पहचाना न जा सके। “

“एल.एस.डी., इसमें मेरी जरा भी रूचि नहीं है। मुझे केवल जगह बताओ। ” डॉ. निवासन ने अधीरता से कहा।

एल.एस.डी. फिर से कमरे के अंदर भागती हुई गई, अपनी स्क्रीन से कागज के टुकड़े पर कुछ लिखा और एक मिनट के अंदर वापस आ गई।

उसने पर्ची डॉ. निवासन को सौंपी और कहा, “यह पर्वतो की श्रृंखला, जंगल व् गुफाएँ श्रीलंका में है और नक़्शे में ये सटीक स्थान है। ” उसने एक विशेष स्थान की ओर इशारा किया, “यह एक पुरानी गुफा जैसी संरचना है। “

“ठीक है, वापस अंदर जाओ। ” डॉ. निवासन ने बस, यही कहा।

एल.एस.डी. को इतना जरुरी काम करने पर उसके हिस्से की वह प्रशंसा नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थी। वह स्वतः प्रेरित लड़की थी और उसके लिए प्रशंसा इतनी जरुरी नहीं थी।

उसने चुपचाप सहमति में सिर हिलाया और धीरे से कहा, “ठीक है, सर।” और वापस कमरे में चली गई।

डॉ. निवासन ने हाथ में कागज लिये एक राहत की साँस ली और बूढ़े आदमी के सुरक्षित कमरे की ओर चल पड़े।

प्रयोगशाला में ओम ने उत्तर देने जारी रखा, “एक दिन मैंने अपनी आँखें तीन ऋषियों के साथ एक कुटिया में खोली। कुटिया बड़ी थी और बाहर से आए अनुयायियों से भरी हुई थी। मैंने उन्हें मिटटी की दीवारों में बने छेद से देखा। उनमे से एक ऋषि मेरे पास आए और बोले, ‘पुत्र, तुम्हे कैसा महसूस हो रहा है ?’ “

ओम ने जैसे ही आँखें बंद करके घटना का वर्णन शुरू किया, स्क्रीन पर तस्वीरें चलनी शुरू हो गई, जहाँ एक गोरा व् लंबा, 50 वर्ष से अधिक आयु का व्यक्ति मुस्कुराता हुआ खड़ा था। उसने एक जोड़ी लकड़ी की खड़ाऊ और एक सादा व् सफेद कुरता और धोती पहनी हुई थी। उसकी दाई कलाई पर लाल व पीले रंग के धागे (कलावा) बँधे हुए थे और बाएँ कंधे से कमर की दाई ओर एक जनेऊ जा रहा था।

“मैं उन्हें व् उनके साथ की वह पहली झलक कभी नहीं भूल सकता, क्योकि वे पहले व्यक्ति थे, जिन्हे मैंने अपनी जिंदगी में देखा था।

“मुझे भूख लग रही है। मैं कहा हूँ ?”

” ‘यह पूछने से पहले की तुम कहाँ हो, तुम्हे पूछना चाहिए की तुम कौन हो ?’ ऋषि ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। “

“मैं उन्हें बताना चाहता था की मैं कौन था, परंतु तभी मुझे एहसास हुआ की मैं यह खुद नहीं जानता। ” ओम ने स्वीकार किया।

“मैं कौन हूँ ? ” मैंने उनसे पूछा।

“इसलिए तुमने यह कहा था, की तुम्हे अपना वास्तविक नाम नहीं पता, जब हमने इस बारे में तुमसे पूछा था ? ” अभी ने टोका और उसे ओम को बीच में रोकने के लिए डॉ. शाइना व् डॉ. बत्रा की घूरती नजरो का सामना करना पड़ा। अभी उनके भाव पढ़ते ही समझ गया की उसे चुप रहना है। ओम ने अपनी बात जारी रखी और स्क्रीन भी उसके अनुसार चलती रही।

जैसे ही ऋषि ने कमरे में प्रवेश किया, बाकी तीनो ने श्रद्धापूर्वक उनके आगे झुकते हुए उनके चरण-स्पर्श किए।

“आदरणीय ऋषि मेरे बगल में बैठ गए और मेरे सिर पर हाथ रखा। “

” ‘मुझे कुछ भी याद क्यों नहीं है ?’ मैंने पूछा। “

” ‘क्योकि तुम्हे आवश्यकता नहीं है। तुम 40 साल के हो, समझो की इस संसार में ये तुम्हारा पहला दिन है। तुम्हे अभी विश्राम की आवश्यकता है, क्योकि तुम्हारे शरीर पर बहुत से घाव है – कुछ तो बिलकुल ताजे, जिन पर अभी टाँके लगाए गए है। इसलिए अपने आप को कष्ट मत दो। ‘ ऋषि ने कहा। “

“मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था, फिर भी अपने हाथ व छाती पर घाव और टाँके देख सकता था। “

” ‘मुझे भूख लग रही है।, ‘ मैंने कहा।”

” ‘मुझे पता है, पुत्र। पर तुम्हे भोजन नहीं दिया जा सकता। तुम्हे अभी भूखे रहना होगा। अब तुम्हे सो जाना चाहिए।’ ऋषि ने मुझसे कहा। “

“दूसरे ऋषियों में से एक ने कुछ इशारा किया। वे तुरंत ही मिटटी के पात्र में द्रव्य लेकर आए। अपनी प्यास बुझाने के लिए मैंने जल्दी से उसे गटक लिया। कुछ देर के बाद मैं सो गया था; परंतु बाद में मुझे बताया गया की मैं डेढ़ सौ दिन, करीब चार महीनो तक, गहरी निंद्रा में था। जब मैं सोया, वर्षा हो रही थी। मैं अभी भी भूख से मरा जा रहा था और कुटिया में कुछ भी नहीं बदला था। तीनो ऋषि अभी भी अग्नि के पास बैठे जड़ी-बूटियों और कुछ घोल पर कार्य कर रहे थे।”

“मैंने अपने आप को फर्श पर रखी चटाई पर लेटे पाया। मेरा शरीर अभी भी घाव और टाँको से भरा हुआ था। वरिष्ठ ऋषि ने फिर से कुटिया में प्रवेश किया और सभी ने उन्हें झुककर प्रणाम किया। “

“उन्होंने उनके अभिवादन को स्वीकारा और मेरी ओर देखा। वह मेरे बराबर में आकर बैठे और मुझे एक बड़ा पात्र दिया। दूसरे ऋषि आए और उसमे पानी भरने लगे, जब तक वह पूरा नहीं भर गया। मुझे नहीं पता था की उसके साथ क्या करना चाहिए था!”

“उन्होंने मुझे पात्र के ऊपर अपना चेहरा ले जाने का निर्देश दिया और तब पहली बार मैंने अपना प्रतिबिंब देखा। मेरा चेहरा कटा-फता और टाँको से भरा हुआ था। मेरा लगभग गंजा सिर युद्ध के निशानों को दर्शा रहा था, जिसका मैं एक हिस्सा रहा होऊँगा। मेरी एक आँख पिघली हुई थी और दूसरी के चारो ओर काले निशान थे। अपना दायाँ कान गायब देखकर मैं डर गया। मैं एक राक्षस की तरह भयानक दिख रहा था।”

स्क्रीन पर ओम के द्रश्य इतने विचलित करने वाले थे की डॉ. शाइना ओर एल.एस.डी. को दूसरी तरफ देखना पड़ा। उसके चेहरे पर कुछ भी सामान्य नहीं दिख रहा था। प्रत्येक अंग खराब हो चूका था।

” ‘पुत्र, तुम कैसा महसूस कर रहे हो ? ‘ ऋषि ने मुझसे पूछा। “

” ‘आप कौन है ? ‘ मैंने प्रतिप्रशन किया। “

” ‘मैं देवोदास हूँ। मैं धन्वंतरि के नाम से भी जाना जाता हूँ। तुम मुझे ‘काशिराज’ भी कह सकते हो। वे सब मुझे ऐसे ही बुलाते है। अब मुझे बताओ, तुम कैसा महसूस कर रहे हो ?’ काशिराज ने एक मुस्कान के साथ उत्तर दिया। “

” ‘मुझे भूख लग रही है।’ मैंने दोहराया। “

” ‘मुझे पता है, परंतु दो पूर्णिमा बीत जाने पर ही तुम कुछ ठोस ग्रहण कर सकते हो। तब तक तुम्हे भूख को सहना सीखना होगा। तुम्हे केवल संतो द्वारा तैयार ओषधि का घोल लेना चाहिए। ‘ “

” ‘मैं कैसे जिंदा रहूँगा ? मैं मर जाऊँगा।’ मैंने तर्क दिया। “

” ‘तुम सह लोगे, जैसे तुम पिछले चार महीनो से करते आ रहे हो। वास्तव में, यदि तुम कुछ खाते हो तो तुम निष्चित रूप से मर जाओगे। अब तुम्हे विश्राम करना चाहिए।’ विनम्र ऋषि ने कहा। “

“कुटिया को छोड़ने के लिए काशिराज दरवाजे तक गए ही थे, जब मैंने पूछा, ‘मुझे बताओ, मैं कौन हूँ ? मेरा असली नाम क्या है ?’ “

” वे पीछे मुड़े और बोले, ‘तुम्हारा पूर्व में कोई नाम नहीं था। वर्तमान में तुम ‘मृत्युंजय’ नाम से जाने जाओगे और भविष्य में तुम्हारे कई नाम होंगे।’ “

“काशीराज ने तब कुटिया से बाहर आकर आवाज लगाई – सुक्षुत ! “

“ओम के मुँह से सुक्षुत का नाम सुनते ही सभी ने एक-दूसरे के चेहरे को आष्चर्य से देखा। सुक्षुत के बारे में कही गयी प्रत्येक बात का अर्थ अब समझ में आ रहा था। दस साधु, धन्वंतरि, हिमालय श्रृंखला, ओषधियो का ज्ञान, टीम के सामने प्रत्येक चीज़ स्क्रीन पर थी। “

“कुटिया के तीन साधु में से एक सुक्षुत थे। सुक्षुत खड़े हुए और कहा, ‘जी गुरुदेव !’ और कुटिया से बाहर चले गए। “

“कुछ देर के बाद सुक्षुत अपने हाथ में जल पात्र लिये वापस आए और उसे मुझे दे दिया। घोल में से पुदीने जैसी गंध आ रही थी और वह हरे रंग का था। मैं किसी भी खाद्य पदार्थ का विरोध करने के लिए असमर्थ था, इसलिए मैं उसे एक ही घूँट में पी गया। उन्होंने मुझे चेहरे पर मुस्कान लिये दयापूर्ण द्रिष्टि से देखा। वे मुझसे बड़े थे। कुछ दिनों बाद उन्होंने मुझे बताया था की वह 49 वर्ष के थे। धन्वंतरि लगभग 70 वर्ष की आयु के थे। “

“वह जो कुछ भी था, उसे पीने के बाद सुक्षुत ने वह मुझसे ले लिया और कहा, ‘मैं सुक्षुुत हूँ। काशीराज द्वारा आयुर्वेद का ज्ञान प्रदान करने हेतु चुने गए दस संतो में से एक। हम काशीराज के पहले तीन विद्यार्थी है। अभी इस समय हम हिमालय की पर्वत – श्रृंखला में निवास कर रहे है। वह देवद्रत है और वह नागेंद्र है।”

जैसे ओम बता रहा था, प्रत्येक वस्तु ऐसे स्पष्ट थी, जैसे की वह उनकी आँखों के ठीक सामने घटित हो रही हो। धन्वंतरि भगवान सद्रश, परंतु वृद्ध दिखाई दिए। दूसरी ओर, सुक्षुत की लम्बी दाढ़ी और शांत चेहरा था और देवद्रत व् नागेंद्र बिना दाढ़ी – मूँछ के थे। सभी ने समान प्राचीन पारंपरिक वेशभूषा धारण की थी और लकड़ी की चप्पल, जिन्हे ‘खड़ाऊँ’ कहते है, पहने हुए थे।

“जब सुक्षुत मुझसे बात कर रहे थे, देवद्रत केले के पत्तो की एक गठरी लिये अंदर आए और उसे सुक्षुत को दे दिया। मैंने एक शब्द नहीं कहा और केवल उनकी बातचीत सुनता रहा। “

” ‘मृतुंजय, मुझे तुम्हारे चोट के निशान का माप इन पत्तियों पर लेना है, जिससे की हम शल्य चिकित्सा कर सके और इन्हे ठीक कर सके।’ देवद्रत ने कहा। “

“उसने माप लिया और कुछ आयुर्वेदिक औषधि और जड़ी – बूटियों का लेप तैयार किया और मेरे घाव पर लगा दिया। बीते समय के साथ मैं ठीक होता चला गया। महीनो उनके साथ कुटिया में रहते – रहते मैं उनसे भलीभाँति परिचित हो गया। “

“जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैंने उनकी दैनिक दिनचर्या में सहायता करनी शुरू कर दी और उनसे चीजे सीखता गया। मुझे अपने और संसार के बारे में कुछ भी नहीं पता था, अंतः उनके बीच रहते-रहते मैंने उनसे सीखना शुरू कर दिया। उनकी सहायता करते-करते मुझे आयर्वेदिक औषधियों का ज्ञान प्राप्त होने लगा।”

” सुक्षुत, धन्वंतरि के प्रथम विद्यार्थी थे। चिकित्सा विज्ञानं के अभ्यास के अतिरिक्त उन्हें एक महत्वपुर्ण कार्य सौपा गया था। यह कार्य था की उनके गुरु धन्वंतरि के शिक्षणो का संकलन अपने अनुभवों द्वारा वृद्धि करके पुस्तकों की शृंखला बनाना, जो आज के समय में जनि जाती है…”

“सुक्षुत संहित ! ” डॉ. बत्रा ओम के पीछे से चिल्लाए।

ओम ने कोई ध्यान नहीं दिया और आगे बढ़ा।

“सुक्षुत संहित – सुक्षुत द्वारा लिखी गई शल्य चिकित्सा पर एक महत्वपुर्ण उत्कृष्ट संस्कृत भाषा है और और्वेद के तीन मूलभूत ग्रंथो में से एक है। यह दो भागो में बँटा हुआ है – ‘पूर्व तंत्र’ और ‘उत्तर तंत्र’। इसके 184 पाठों में 1,120 बीमारियाँ, 64 खनिज स्त्रोत की सामग्रियों और 57 पशु स्त्रोत पर आधारित सामग्रियों का वर्णन है। “

शाइना ने एल.एस.डी. से फुसफुसाते हुए कहा, “प्रेम ने सुक्षुत नाम का जिक्र किया था और तुमने उसके बारे में पढ़ा था, जब अभी विज्ञानं के ऊपर अपनी पौराणिकता की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयास कर रहा था। सुक्षुत कौन है ? “

“कहा जाता है की सुक्षुत मूलतः दक्षिण भारत के चिकित्सक थे, जो वाराणसी में कार्यरत थे। वे गंगा नदी में तैरते शवों का प्रयोग ऐसे कार्य और अभ्यास के लिए करते थे, जिसका इससे पूर्व किसी ने साहस भी नहीं किया था; जैसे एक मृत शरीर के अंगो को दूसरे शरीर में जोड़ना। सर्वप्रथम सुक्षुत नाम का उल्लेख ‘बाँवर पांडुलिपि’ (चौथी व् पांचवी शताब्दी) में है, जिसमे सुक्षुत का नाम हिमालय में निवास करने वाले दस संतो की सूची में से एक है। ‘सुक्षुत संहित’ का बाद में अरबी में अनुवाद हुआ, फिर अंग्रेजी में, जिसके अनुसार ही आधुनिक विज्ञानं की प्लास्टिक सर्जरी बनी, लिखी और प्रदर्शित की गई। यह सब कहना अतिश्योक्ति नहीं है की सुक्षुत विषय के प्रथम प्लास्टिक शल्य चिकित्सक थे।” डॉ.बत्रा ने दबी आवाज़ में कहा।

“और धन्वंतरि कौन है, जिन्हे हमने स्क्रीन पर देखा, जिसका ओम ने उल्लेख किया था ?” शाइना ने बहुत उत्सुकता से पूछा।

“काशीराज, देवोदास और गुरु धन्वंतरि सब एक ही व्यक्ति के नाम है। ऐसा माना जाता है की धन्वंतरि आयर्वेदिक उपचार के भगवान् है। ” अभी ने व्याख्या की।

“यह कहा जाता है की वही देवोदास ‘काशी के राजा’ के रूप में पुनः प्रकट हुए थे। ‘काशीराज’ के नाम से भी उन्हें जाना जाता है। ” एल.एस.डी. भी बातचीत में शामिल हो गई।

अभी ने आगे बताया, “धन्वंतरि ने अन्य देवताओ को वृद्धता, रोग और मृत्यु से भी मुक्त कराया था। उन्होंने अपने हिमालय आवास में दस साधुओ को शल्य चिकित्सा की दक्षता में निपुण किया था। सुक्षुत को धन्वंतरि अपना सर्वोत्तम उत्तराधिकारी मानते थे और उन्होंने उन्हें आयुर्वेद की अन्य विद्या भी सिखाई थी। “

“धन्वंतरि को औषध विज्ञानं की सभी विद्याओ का भगवान् माना जाता है। औषध विज्ञानं पदार्थो का एक बृहत कोश है, जिसे कुछ भागो में ‘धन्वंतरि निघण्टु’ के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में पाया जाने वाला प्राचीनतम ग्रंथ ! “

“हम उत्तम स्वास्थ्य के लिए, विशेषतया धनतेरस के अवसर पर, धन्वंतरि की पूजा करते है, जिसे धन्वंतरि का जन्मदिवस माना जाता है|” अभी ने जानकारी प्रदान करते हुए कहा |

वहाँ बूढ़े आदमी के कमरे में डॉ. निवासन ने नक्शा और कागज का टुकड़ा, जिस पर स्थान चिन्हित था, बूढ़े आदमी को सौंपते हुए राहत की साँस ली | उसने तेजी से परिणाम के लिए डॉ. निवासन की प्रशंसा की | डॉ. निवासन अभी तक उस सदमे से नहीं उबर पाए थे, जो उन्होंने पिछली बार कमरे में आने पर अनुभव किया था |

बूढ़े आदमी ने उपलब्धि के उत्साह में पूरी तरह डूबे होने के कारण डॉ. निवासन की उदासी पर ध्यान नहीं दिया और इसके अलावा, उन्हें फिर से आदेश दिया | डॉ. निवासन के लिए नया कार्य यह था की वीर को नक़्शे पर चिन्हित स्थान पर भेजा जाए और वहाँ जो कुछ भी मिले, उसे सीधे उनके पास लाया जाए | डॉ. निवासन ने चुपचाप बूढ़े आदमी से नक्शा लिया और कमरे से बाहर चले गए |

कुछ देर बाद, द्वीप के जंगल में छिपे धावा बोलने को तैयार दोनों आदमियों ने देखा की वीर सुविधा केंद्र से बाहर आ रहा था | उनकी स्क्रीन पर सुविधा केंद्र का ३डी चित्र दिख रहा था, जहाँ ओम को बंधक रखा गया था | वीर जिस स्थान पर जा रहा था, वह श्रीलंका में था | रॉस द्वीप भारत के बिलकुल दक्षिण में होने के कारण उस स्थान से ज्यादा दूर नहीं था | वीर ने रक्षको में से एक को एक निजी हेलीकॉप्टर की व्यवस्था करने का आदेश दिया, क्योकि उसे कार्य समाप्त करने के लिए कम समय दिया था |

द्वीप के जंगल में छिपे दोनों आदमियों ने वीर के हाथो में नक़्शे को देखा और तुरंत ही परिस्थिति को भाँप लिया | वह अपनी योजना बदलने के लिए मजबूर हो गए | उन्होंने निश्च्य किया की उनमे से एक वीर का पीछा करेगा और दूसरा इमारत की घटनाओ पर नज़र रखेगा | उनमे से एक ने आपने हथियारों का एक हिस्सा दूसरे को दिया और वीर का पीछा करने के लिए चला गया | हवा में हेलीकॉप्टर का पीछा निचे पानी में आधुनिक तीव्र गति वाली नाव द्वारा किया जा रहा था |

जैसे ही डॉ. निवासन पूछताछ कक्ष में लौटे, प्रेम और अभी के बीच विचार- विमर्श बीच में ही रुक गया | जैसे ही उन्होंने प्रवेश किया, उनकी प्रतिच्छाया स्क्रीन पर चमक उठी, जो साबित करती थी की बंद आँखों के बावजूद ओम ने उनकी उपस्थिति को महसूस कर लिया |

जैसे ही डॉ. निवासन ने अपनी तस्वीर देखी, वे झुँझलाकर बोले, “मैं स्क्रीन पर क्यों हूँ ? यहाँ क्या हो रहा है ? तुम लोगो को जो करने के लिए कहा गया है, उसे गंभीरता से करके अपने – अपने घर वापस क्यों नहीं जाते ? ” वे गरजे |

उनका व्यवहार अप्रत्याशित था, जिससे सभी दंग रह गए थे | डॉ. शाइना और डॉ. बत्रा उनके पास गए, यह देखने के लिए की वे ठीक तो है ! पर डॉ. निवासन ने उन पर ध्यान न देते हुए उन्हें तेजी से हाथ हिलाकर इशारे से वापस भेज दिया |

ओम एक जंगली अभिव्यक्ति के साथ डॉ. निवासन को घूर रहा था और डॉ. शाइना को वापस अपनी तरफ आते देखकर उसने आँखें फिर बंद कर ली | शाइना बैठी और ओम को आगे बढ़ने का संकेत दिया |

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