अध्याय :- 2 अनिश्चित शुरुआत

Unexpectedstories.in दरवाज़ा खुला और एक लड़की अंदर आयी | उन्होंने टीम को अपना परिचय देते हुए अपना नाम डॉ। शाइना बताया। वह एक प्रसिद्ध साइकेट्रिस्ट थी। उन्हें हिप्नोसिस नॉलेज के क्षेत्र में उन्हें ज़रूरी काम के लिए प्रस्तुत किया गया और सराहा गया था और उनके अनुसन्धान के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान की गयी थी, अर्थात: यही अनिश्चित शुरुआत थी|

जैसे भी ज़रूरत पड़ती, उन्हें सरकार अपने लिए या अपने द्वारा कही भी नियुक्ति कर देती थी।

उन्हें पुणे, महाराष्ट्र, उनके गृह राज्य से बुलाया था | उनकी उम्र लगभग 35 वर्ष के आस पास थी | साढ़े पांच फ़ीट लम्बी डॉ। शाइना सूंदर, गोरी और सांस्कृतिक लड़की थी | उनके व्यक्तित्व से आदर और गर्व की झलक दिखाई पड़ती थी और वह एक आशावादी सभा अपने चारो ओर बनाये रखती थी | गहरे भूरे रंग के बाल उनकी पीठ तक लहराते थे | वह एक सोमिय मुस्कान अपने चेहरे पर हमेशा रखती थी | इसके अलावा, उन्होंने कढ़ाई की हुई काले रंग की एक कुर्ती, एक सफ़ेद पटियाला सलवार, कंधो पर काले रंग की ओढ़नी और पैरो में पारम्परिक जुत्तियों का एक जोड़ा पहना हुआ था|

भगवान को एक साथ सौंदर्य और बुद्धि बाँटने के लिए नहीं जाना जाता, लेकिन डॉ। शाइना के पास यह दोनों थे | सर से लेके पाऊँ तक उन्होंने सभी प्रकार की आत्मिक शांति और सफलता के लिए पहने जाने वाले रत्नो को पहना हुआ था | उनकी बायीं भुजा पर एक ताबीज बंधा हुआ था दाएं हाथ में सोने की दो चूड़ियां, गले में एक पतली सोने की चैन और उँगलियों में रत्नो से जड़ित कुछ अंगूठियां थी |

वह आदमी अभी भी कुर्सी से बंधा हुआ था और उसके चारो और जो चेहरे थे, वह उसने कभी नहीं देखे थे| अपने सामने चाहे गहरे कोहरे के अलावा टेबल और चारो और बैठे प्रत्येक व्यक्ति की हलकी परछाई ही देख पा रहा था | वह अवचेतन रूप से जगा हुआ था |

उसका अर्धचेतन अवस्था में होना उसे जबरदस्ती दिए गए नशीले इंजेक्शन का प्रभाव था | उसे सब धुंधला दिख रहा था |

अपने सहकर्मियों से मिलने के बाद डॉ। शाइना बंदी के सामने बैठ गयी | जिस तरह से वो रौशनी का अभयसत होने के लिए अपनी आँखों को मिचमिचा रहा था, उससे पता लग रहा था की वह काफी देर से अँधेरे में बैठा हुआ था| डॉ। शाइना की आँखें आसमान के नीले रंग जैसी तीव्र और गहरी थी| उनकी आंखों में सम्मोहन की शक्ति थी| आदमी को देख कर उन्हें ऐसा लग रहा था की वह भी कोई रहस्य अपने में छुपाये बैठा है| उसी समय उन्हें यह भी एहसास हुआ की वह आदमी अब भी बिलकुल शांत और निश्चिन्त था| उसके चेहरे पर कोई डर या चिंता की लहर दिखाई नहीं दे रही थी। वह साहसी और आत्मविश्वास से पूर्ण प्रतीत हो रहा था|

दूसरी ओर, अब पूछताछ शुरू होने वाली थी|

इससे पहले की वह कुछ बोल पाती, आदमी सहजता से अपना परिचय देते हुए बोला ‘ओम शास्त्र’|

यदि वह आदमी अपनेआप को मुक्त करने की या चिल्लाने की कोशिश करता तो डॉ। शाइना को हैरानी नहीं होती, क्योंकि, ऐसा उन्होंने इससे पहले सभी मामलो में अनुभव किया है पर इस आदमी के धैर्य ने उन्हें व्याकुल कर दिया और उन्होंने डॉ। निवासन की और देखा| आदमी ने भी अपना सर डॉ। शाइना की नज़रों की दिशा में घुमाया| डॉ। निवासन की स्पष्ट झलक देखने के लिए उसे थोड़ा आगे तक देखना पड़ा| जैसे ही उसने ऐसा किया, उसकी आँखें बड़ी हो गयी और वह एकाएक चिल्लाया “चिन्ना!”

सभी लोग हैरान हो कर उसकी तरफ देखने लगे |

“क्या?” परेशन होकर भारी आवाज़ में डॉ। बत्रा ने पूछा |

वह आदमी डॉ। निवासन को देखता रहा, जैसे वह उन्हें लम्बे समय के बाद देख रहा हो !

डॉ। निवासन गुस्सा थे | उन्हें लग रहा था की उनका मजाक उदय जा रहा है |

वीर भी इस घटना से हैरान था | वह इस तरह के आदमी से कभी नहीं मिला था|

अचानक से किसी ने एक रूयी के साथ अघोरी की नाक को धक् दिया | रूयी से अजीब सी बदबू आ रही थी |

ओम शास्त्र धीरे धीरे बेहोश हो गया | न कोई विचार, न कोई भावना और सब कुछ शांत हो गया |

उसे यह पता भी नहीं था की वह अब सम्मोहित होने वाला है |

“तुम कौन हो?” डॉ। शाइना ने बंदी से पूछा, जब वह पूरी तरह से नियंत्रण में हो चूका था|

“ओम शास्त्र |” उसने बेहोशी की हालत में जवाब दिया |

यह हम जानते है शास्त्र जी |” डॉ। शाइना ने कहा, हमे वह बताओ जो हम नहीं जानते |” उन्होंने आगे कहा |

“तुम कुछ नहीं जानते !” ओम शास्त्र बड़बड़ाया |

हाँ, शास्त्र जी, हमे चीज़ों का ज्ञान नहीं है | इसलिए तुम यहाँ हो | लेकिन एक बात , जो हम बिलकुल जानते है , वो ये है की तुम्हारा असली नाम ‘ ओम शास्त्र ‘ नहीं है |”

“मुझे याद नहीं है |” ओम शास्त्र ने धीरे से कहा |

“तुम्हारा असली नाम क्या है ?” डॉ। शाइना ने दोहराया |

‘सम्मोहित व्यक्ति द्वारा एक आसामन्य जवाब|’ डॉ। शाइना ने सोचा |

अपने हाथो में एक पौराणिक किताब के साथ कुर्सी पर बैठे अभी ने कहा, “झूठ!”

“यह झूठ नहीं बोल सकता |” विरोध करते हुए डॉ। बत्रा बोले, उसे नार्को विश्लेषण की दवाइयां दी गयी है |” डॉ। बत्रा साफतौर पर हताश थे |

“नार्को!” अभी ने अनजान होकर कहा और डॉ। बत्रा की और जवाब के लिए देखा |

ये सच की दवा है | इसे लेने के बाद कोई झूट नहीं बोल सकता |” व्याख्या में कोई दिलचस्पी न रखते हुए डॉ। बत्रा ने संक्षेप में उत्तर दिया |

डॉ बत्रा का पूरा नाम डॉ तेज बत्रा था | वह एक ईंमानदार और प्रोन आदमी थे | वह सिर्फ तार्किकता और बुद्धिमानता ही समझते थे | थोड़े गुस्सैल भी थे | डॉ बत्रा का व्यवहार कई बार अप्रत्यशित रहता था | विलक्षण परिष्तिथियों में ही वह आशावादी हो पाते थे |

और वो सम्मोहित भी है | डॉ। शाइना ने डॉ। बत्रा से सहमति जताते हुए कहा |

दोनों ने अभी की तरफ देखा | अभी अपने कंधे झटकते और फुसफुसाते हुए बोला, कुछ चीज़ें चिकित्सा विज्ञानं से परे है |” और अपनी पुस्तक पढ़ने लगा |

अभी का परिचय

अभी ने अपने जीवन के 30 साल हिन्दू पौराणिक ग्रंथो को पढ़ने में गुजार दिए थे और इसीलिए उसे इस क्षेत्र में अपार ज्ञान था| अम्बिकापुर नामक एक छोटे से शहर में, राजपुरोहित के, एक ब्राह्मण परिवार का वंशज होने के कारण उसे अंधविश्वासी लोगो द्वारा देवताओं की तरह पूजा जाता था। सम्मान और प्रतिष्ठा के उचतम्म रूपों के साथ संपन्न वह अपने दृष्टिकोण में गर्व से संरेखित था। अपनी गलतियों के लिए दुसरो की आलोचना करना उसके स्वभाव में था।

वह 5 फ़ीट 8 इंच लम्बा, थुलथुले शरीर के साथ, काले रंग का व्यक्ति था| उसने एक तंग सफ़ेद कुरता और नीली डेनिम जीन्स पहनी हुई थी, जिसमे से निकलती हुई अपनी तोंद से वह अनजान था| वह पौराणिक कथाओ और अन्धविश्वास का कट्टर अनुयायी था| और यह उसके पहनावे से साफ़ दिखाई दे रहा था| उसने विभिन्न प्रयोजनो के लिए अनेक रत्नो से जड़ी कई अंगूठियां पहनी हुई थी| बिना पूछे वह कभी भी, किसी भी समस्या में अपनी अनुठीयों या ग्रहो के बारे में टिप्पणी देने से नहीं चूकता था| उसके बाएं हाथ की कलाई पर एक रक्षा सूत्र बंधा था और गले में रुद्राक्ष की माला थी| उसके माथे पर ‘ऊं’ आकार के चन्दन का तिलक लगा हुआ था और पैरो में कोल्हापुरी चप्पलें थी| उसके कंधे पर जूट से बना एक थैला टंगा था, जिसमे हिन्दू मंत्रो पर आधारित किताबे थी|

“जो कुछ भी याद है, हमे बताओ शास्त्र जी|” मुद्दे पर वापिस आते हुए डॉ। शाइना बोली|

ओम शास्त्र के चेहरे पर अनेक भाव, जैसे वह बोलता गया, बदलते गए-मुस्कान, शांति, चिंता, और डर|

“मुझे बंदा बहादुर याद है|” ओम शास्त्री ऑंखें बंद किये ही बड़बड़ाया|

डॉ। बत्रा उस नाम को सुनकर आश्चर्यचकित रह गए, मानो वह भी बंदा बहादुर को जानते हो|

“वह कौन है?” अभी ने पूछा|

मेरे जनरल| शास्त्र ने कहा|

“क्या वह भी तुम्हारे टीम का हिस्सा है?”

“हाँ!”

“वह अब कहा है ?”

“वह मर चूका है |”

“वह कैसे मरा ?”

“उनकी हत्या की गयी थी|”

“उसे किसने मरा ?”

“फरुख्शियर ने |”

“तुम्हे और कोई याद है ?”

“संजय|”

कौन संजय ? संजय दत्त ? संजय सूरी ? या संजय लीला भंसाली ?”

अभी ने व्यंग्य करते हुए पूछा|

जिस लड़की ने अभी से अघोरी के बारे में सवाल किया था, वह खिलखिलाकर हंस पड़ी| ल स डी यानी की लीसा सेमुअल डिकोस्टा| पेशे से एक हैकर ल स डी बहुत सारे ऑनलाइन जालसाजी और बैंक खातों की जब्ती में शामिल थी| 25 साल की उम्र में ही उसने भारतीय सिबेर सेल का ध्यान आकर्षित कर लिया था , लेकिन वह इस बारे में बिलकुल भी परेशान नहीं थी| बिना किसी उपाधि के ही वह निपुण थी| ल स डी एक सूंदर लड़की थी| शिष्टाचार में देसी और आपरीक्षरत थी, लेकिन अपने काम में चतुर और बुद्धिमान थी| अपने काम के अतरिक्त वह सभी चीज़ों के प्रती लापरवाह थी|

“शायद संजय मांजरेकर|” L.S.D. ने मजाक करते हुए कहा|

ल स डी स्वभाव से बेफिक्र थी| उसकी जिहा शायद ही कभी उसके नियंत्रण में होती थी| उसका चेहरा आसानी से पड़ा जा सकता था| कोई भी उसे देखकर उसके मन में चल रहे विचारो को जान सकता था| L.S.D. एक छोटे से शहर से यहाँ आयी थी, जिसकी वजह से उसका एक विशेष प्रकार का अप्रभावित लहजा था|

उसके काले घुंगराले बाल थे| उसकी आँखें बादामी रंग की थी| उसने एक्सेसरी के साथ फूलो वाली सफ़ेद रंग की ड्रेस पहनी हुई थी और एक काला मोटा चश्मा, जो उसे काफी मॉडर्न लुक दे रहा था और पीरो में चमकदार ऊँची हिल्स उसके लम्बे और डूडल पीरो को और सूंदर बना रही थी| उसने अपनी कलाई में अलग-अलग रंग के ब्रेसलेट पहने थे और गले में एक कुल्हाड़ी के आकार का पेन्डेन्ट पहना था|

“संजय! गवल्गन का बेटा|” ओम शहस्त्रा ने कहा|

“और तुम उसे कैसे जानते हो?” शाहिस्ता ने पूछा|

“वह संजय था, जिसने हस्तिनापुर का राजा धृतराष्ट्र का युद्ध के दौरान मार्गदर्शन किया था|” ओम ने जवाब दिया|

वह आगे बोला, में जब हस्तिनापुर का प्रधानमंत्री था, तब उससे मिला था| मेरा नाम विरुद्ध था|”

अभी एकदम से नामो के बारे में सोचने लगा और धीरे से बोला, “मैंने यह नाम पहले सुना है|”

” खैर!” शाइना आगे बढ़ना चाहती थी|

“आपको समझ नहीं आ रहा है, यह महाभारत काल में जीवित होने का दवा कर रहा है|” अभी तेजी से बोला|

“तुम चाहते हो की मैं इसकी सभी पौराणिक बकवास पर विश्वास करू?”

“यह बकवास नहीं है ||आप||”

इससे पहले की अभी अपना वाकया पूरा कर पाता, शाइना ने दूसरा प्रश्न उससे पूछा|

“और कौन से नाम है तुम्हारे पास, शहस्त्रा जी?”

“सुशेन!” ओम शास्त्र ने मुस्कराहट के साथ जवाब दिया|

“तुमने सुशेन के रूप में क्या किया?” शाइना ने जोर देकर पूछा|

“मैं एक वेध था|”

“केवल यही है या तुमने और भी किसी नाम का उपयोग किया था ?”शाइना ने पूछा |

“मैं एक बार विष्णु गुप्त भी था|” उसने जवाब दिया|

शाइना ने एक और नाम सुनते ही अपनी आँखें तरेरते हुए उत्तेजित होकर अपने हाथ हवा में झटक दिए|

“और तुमने विष्णु गुप्त के रूप में क्या किया?” उन्होंने व्यग्रता से पूछा|

ओम शास्त्र कुछ बड़बड़ाने लगा| पर वह क्या बोल रहा था, यह किसी की समझ में नहीं आया|

वयदरीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ति रोगाश्च शत्रव एवं प्रहरन्ति देहम | आयुष्यच परसवितबहीणघटादीअमभ: लोकस्थाप्यहितमाचरतीति चित्रम||

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