अध्याय :- 4 इतिहास से लिए गए नाम

Unexpectedstories.in डॉ निवासन ओम के पीछे की ओर कुर्सी पर बैठ गए|

“चिन्ना, कृपया ऐसा न करे| आप मुझसे जो भी पूछेंगे, मई उसमे सहयोग करने के लिए तैयार हूँ|” ओम शास्त्र ने विनती की| उसकी नज़र डॉ निवासन की ओर इशारा करते हुए छत्त की ओर टिकी हुई थी| डॉ निवासन ने डॉ शीआना और डॉ बत्रा की ओर देखा| उन दोनों के चेहरे ने भी इसी बात को व्यक्त किया|

“किर्प्या शुरू करें|” डॉ निवासन ने असहमति जताते हुए नाराज़गी के साथ आदेश दिया| उनके चेहरे पर ‘चिन्ना’ शब्द सुनकर झुंझलाहट स्पष्ट रूप से दिख रही थी|

ओम को फिर से दवा देकर दुबारा पूछताछ शुरू की गयी|

पहला सवाल प्रेम के लिए ध्यान देने और उसे दुसरो को उसका मतलब समझने के लिए था|

तुमने विष्णु गुप्त के रूप में क्या सलाह दी थी?” शाइना ने बेहोश ओम से पूछा| ओम ने संस्कृत का श्लोक दोहराया-

व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ति रोगाश्च शत्रव ेव प्रहरन्ति देहम| आयुष परसवेतभीनघटादिवामभ: लोकस्थाप्यहितमाचारतीति चित्तं||

डॉ शाइना प्रेम की ओर देख रही थी| उसने अंगूठे के इशारे से काम हो जाने का संकेत दिया|

“तुमने विष्णु गुप्त के रूप में किसे सलाह दी थी?”

“चन्द्रगुप्त मौर्य को|”

“तुम ओम शास्त्र क्यों बने?”

“अपनी असली पहचान छुपाये रखने के लिए|”

“किस्से?”

“इस दुनिया से|”

“तुम्हारी वास्तविक पेहचान क्या है?” डॉ शाइना छुपे हुए उत्तर पता लगाने में सक्षम थी|

“मेरी सभी पहचाने वास्तविकता है|”

शाइना ने इस पर मानसिक रूप से गौर किया- ‘मेरी सभी पहचाने वास्तविकता है|’

“तुम ओम शास्त्र के रूप में वाराणसी में क्या कर रहे थे?”

“खोज|”

“खोज! किसकी?”

“सुभाष चंद्र बॉस की|”

सभी सहकर्मियों ने आश्चर्य से एक-दूसरे की ओर देखा| शाइना नहीं जानती थी की वह आगे क्या पूछे या कहे? ‘यह बहुत अजीब होता जा रहा है’, ऐसा उन्होंने सोचा| आखिर में उन्होंने एक लम्बी सांस ली और आगे बोली, “सुभाष चंद्र बॉस मर चुके है|”

“नहीं, वह मरे नहीं है| वह बस, एक दूसरे नाम के साथ रह रहे है|” ओम ने दृढ़ता के साथ कहा|

“तुम ऐसा क्यों सोचते हो की वह मरे नहीं है और किसी और नाम के साथ जी रहे है?”

“मैं ऐसा सोचता नहीं हु; मैं जनता हूँ|”

“तुम्हे इस बात पर इतना विश्वास कैसे है?” शाइना ने पूछा|

“क्योंकि मैं उन्हें महाभारत काल से जनता हूँ|”

शाइना ने आंखें घूमते हुए सोचा की इस बात का कोई सर-पैर नहीं है|

“तुम उन्हें क्यों ढूंढ रहे हो?”

इस प्रश्न के जवाब ने अभी को हिलाकर रख दिया|

“क्योंकि वह अश्वथामा है”

“अश्व…क्या?” शाइना को समझ नहीं आया|

अभी अश्वथामा का नाम सुनकर उसकी बात गौर से सुनने लगा और शाइना की और आने लगा|

“अश्वथामा|” ओम ने दोहराया|

“उससे पूछिए की वह किस अश्वथामा की बात कर रहा है?” अभी ने शाइना के कान में धीरे से कहा|

“द्रोणाचार्य के बेटे अश्वथामा, जो कृष्ण के द्वारा दिए गए श्राप से अमर है|” ओम ने बिना शाइना के कुछ बोले जवाब दिया|

डॉ शाइना केवल ‘कृष्ण’ ही समझ पायी|

अभी डॉ बत्रा की और मुड़कर बोला, “इसकी बातों का कोई मतलब नहीं बन रहा है|”

शाइना ने पूछा, “तुम और किसकी तलाश कर रहे हो?”

टूट ती हुई आवाज़ के साथ उसने बताया, “परशुराम की|”

इन सबको उन्होंने फ़िज़ूल समझते हुए पूछताछ जारी रखी|

“विष्णु गुप्त एक कोड नाम जैसा प्रतीत होता है|” डॉ बत्रा ने घंभीर विचार करते हुए कहा|

“या हो सकता है, वह मानसिक रूप से अवस्थ हो या दोहरे व्यक्तित्व का मरीज हो अथवा फिर थोड़ा पागल हो!” उन्होंने आगे कहा|

“यह पुनर्जन्म का मामला भी हो सकता है|” अभी ने पौराणिक दृष्टिकोण के साथ कहा|

डॉ बत्रा ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया|

“तुमने ओम नाम से पहले और किन नामो का उपयोग किया है?” शाइना ने पूछा|

“गोविंदलाल यादव, बेहराव सिंह, सुवर्ण प्रताप रेड्डी, बंकिमचंद्र चकर्वर्त, गुरशील सिंह खुल्लर, विधुर, ओम शास्त्र, हातिम अली मौलवी, प्रोटीम दस, विष्णु गुप्त, कबीर, शुषेण, जयशंकर प्रसाद, मधुकर राओ, अधिरयण|” ओम ने रटी हुई कविता की तरह बताया|

उसका उच्चारण, लहजा और चेहरे के भाव प्रत्येक नाम के साथ बदल रहे थे| बेहराव सिंह, हातिम अली मौलवी, गुरशील सिंह खुल्लर और सुवर्ण रेड्डी ताकत और बहादुरी के स्वर में बोले गए थे| बंकिमचंद्र चक्रवर्ती बंगाली तरीके से, कबीर और सुषेण शांति की लहर के साथ बोले गए था|

उस कमरे में हर कोई उसकी स्व्भविक और त्रुटि-रहित प्रतिक्रिया से अचंभित था| यहाँ तक की सबसे अच्छे अभिनेता थे,यहाँ तक की सबसे अच्छा अभिनेता भी यह इतने अच्छे से नहीं कर सकते थे|

शाइना ने तनाव दर्शाते हुए अपना सर पकड़ लिया| डॉ निवासन भी पहली बार में हैरान थे| L.S.D ने ओम के द्वारा बोले गए सभी नामो को लिख लिया था| प्रेम शाइना द्वारा लिखे गए नोट्स को पढ़ रहा था| प्रेम के मन में अचानक कुछ आया और वो डॉ बत्रा के पास गया| इस दौरान ओम अर्द्ध-मूर्छित अवस्था में नाम ले रहा था|

“स…सर, जब ओम ने वि…विष्णु गुप्त का नाम लिया था, मुझे विश्वास था की वो 300 इसा पूर्व के समय की बात कर रहा है; क्योंकि विष्णु गुप्त चाणक्य का असली नाम था| ओ…और वो चन्द्रगुप्त मौर्य का मुख्या सलहाकार था| आप मुझे पा…पागल समझ सकते है, लेकिन…” प्रेम ने अपने सामान्य अनिश्चित स्वर में कहा| लेकिन उसे बीच में ही रूकते हुए डॉ बत्रा ने कहा, “नहीं प्रेम, मैं तुम्हे पागल नहीं समझ सकता हूँ; बल्कि यदि वह वास्तव में चाणक्य के बारे में बात कर रहा है तो यह उसी बंदा बहादुर के बारे में बात कर रहा था, जिसे मैंने सोचा था, किन्तु विश्वास नहीं किया| मुझे बाँदा बहादुर के बारे में भी कुछ पुष्टि करने की आवश्यकता है| मुझे थोड़ा समय दो” डॉ बत्रा ने फ़ोन पर कॉल करने के लिए शमा मांगते हुए कहा|

L.S.D. प्रेम के पास आयी| वह बहुत उत्साहित लग रही थी|

मैंने तुम्हारी बातचीत सुन ली थी| 300 इसा पूर्व, मतलब 2317 साल पहले| है न?” L.S.D हवा में हिसाब लगाती हूँ बोली|

“क्या यह संभव है की वह समय के आगे पीछे जा सकता है?” L.S.D., के उत्तेजित अनुमान के कारण मानो उसकी आँखें बहार आ गयी हो|

परन्तु, उस विचार ने प्रेम को कुपित कर दिया और वो चिढ़कर बोला, “वो ए…एक धो…धोकेबाज़ के अलावा कु…कुछ भी नहीं है|”

“बीजी, शास्त्री अकाल!” (नमस्ते माँ) डॉ बत्रा फ़ोन पर सामान्य से ज्यादा ऊँची आवाज़ में बात कर रहे थे, क्योंकि उनकी 80 साल की माँ को सुनने में तकलीफ होती थी|

डॉ बत्रा की आवाज़ इतनी ऊँची थी की सब उन्हें सुन सकते थे और चूँकि वहां बहुत शांति थी, सभी लोग आसानी से और ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे| यहां तक की L.S.D. ने अभी अपना काम रोक दिया, जिससे कीबोर्ड पर बटनो की भी आवाज़ आनी बंद होगयी थी|

“जिन्दा रह पुत्तर!” (जीते रहो पुत्र) दूसरी और से एक बूढी आवाज़ आयी|

“एक गाल दस्सो मैनु, बंदा बहादुर कौन सी?” (मुझे एक बात बताओ, यह बंदा बहादुर कौन था?) डॉ बत्रा ने पंजाबी में पूछा|

“पुत्तर, बंदा सिंह बहादुर, श्री गुरु गोविन्द सिंह जी डा जनरल सी|” (बेटा, बंदा सिंह बहादुर, श्री गोविन्द सिघ जी के प्रधान थे) एक साथ दो आवाज़ों में बहुत आदर वे सम्मान के साथ जवाब आया| एक आवाज़ बूढी माँ की थी| जब डॉ बत्रा ने दूसरी आवाज़ सुनी तो उन्होंने पीछे मुड़कर देखा और वह तुरंत समझ गए की वो किसने बोला था| वह ओम को सभी सवालो के जवाब, जो वह अपनी माँ से पंजाबी में पूछ रहे थे, देते देख चौंक उठे; क्योंकि ओम उनका जवाब अर्द्ध मूर्छित अवस्था में ऐसे दे रहा था, जैसे वह सवाल उससे किये गए हो! यह असाधारण था| डॉ बत्रा के पैर डगमगा रहे थे, क्योंकि जो कुछ भी हो रहा था, वह उसकी व्याख्या करने में विफल थे| वह पहले से ही बहुत कष्ट में थे और जल्द-से-जल्द इस जंजाल से बहार निकलना चाह रहे थे|

“ओहना डा इन्तेकाल किस तरह होया सी?” (उनकी मौत कैसे हुई थी?) डॉ बत्रा ने अपनी माँ से फ़ोन पर धीरे से पूछा, लेकिन ओम को ध्यान से देख रहे थे|

“ओहना नू मुग़ल बादशाह फरुख्शियर ने मरवाया सी|” (उन्हें मुग़ल बादशाह,फरुख्शियर द्वारा मरवाया गया था) उनके फ़ोन से और उनके पीछे से आवाज़ आयी|

इससे डॉ बत्रा हैरान रह गए और उन्होंने अपनी बातचीत को दूर से जारी रखने का फैसला किया, जहाँ से उन्हें सुना न जा सके| मैं कमरे से बहार चले गया| कमरे में सभी लोग हैरान थे| वह इस बात की पुष्टि कर सकते थे की वह प्राचीनकाल की बात कर रहा था और सभी सवालों के जवाब उसी भाषा में दे रहा था, जिसमे वह पूछे जा रहे थे – पंजाबी; लेकिन कोई नहीं जनता था की क्यों?

वहां की शांति भंग करते हुए वीर अंदर आया| वह हांफ रहा था, जिससे पता लगा की वह भागता हुआ आया था|

उसने एक बार ओम शास्त्र को देखा और लम्बे लम्बे कदम रखता हुआ अंदर बढ़ता गया|

“एमी अदि?” (क्या हुआ?) डॉ निवासन ने तेलगु में पूछा| वीर के हाव भाव देख कर उन्हें सबको बातचीत में शामिल करना ठीक नहीं लगा|

“वर्षं पड़तोड़ि!” (बारिश हो रही है!) बहभीत वीर ने जवाब दिया|

“आईटी?” (तो क्या हुआ?)

डॉ निवासन ओम शास्त्र को लेकर पहले ही बहुत परेशां थे, उन्हें के नया नाटक नहीं चाहिए था|

“आनिकी गैंताल कृतं येला तेलुसिंडी?” (उसे घंटो पहले ही यह बात कैसे पता थी?) वीर ने ओम की तरफ इशारा करते हुए पूछा|

ओम ने भी उसी भाषा में कुछ बोलना शुरू कर दिया-

“मेलगगा उशनारिता मुंडू 2 डिग्री तंगीगड़ी तारवता िन्दा 5 डिग्री वारूक़ टग्गुमुखम पंडीडी| ढली लो तेमा ानीपंचिंदी, ताड़ी मट्टी सुवासना वोचिन्दी| ढली 40 किलोमीटर वेगम तो वोस्टोडि वर्षं वोस्टोडि आनी ानुकूननु|

(तापमान 2 डिग्री नीचे गिर गया था, उसके बाद और 5 डिग्री| हवा 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चलने लगी थी| मैं हवा में उमस महसूस कर सकता था और गीली मिटटी की सुगंध भी| इसीलिए मैंने अनुमान लगाया की बारिश होगी|) ओम शास्त्र ने निश्चित रूप से उत्तर दिया|

“आप सब लोग क्या बात कर रहे हो?” डॉ बत्रा ने बीच में कमरे में प्रवेश करते हुए कहा|

जवाब का इंतजार

बाकी सब भी बेसब्री से जवाब का इंतजार कर रहे थे| वीर ने डॉ बत्रा और बाकि लोगो को समझाना शुरू किया| तभी डॉ निवासन ने कहा, कुछ नहीं|” किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| डॉ शाइना एक बार फिर परेशां थी की वह ओम शास्त्र से क्या पूछे; और इसीलिए वो अगले आदेश के लिए अपने बॉस की ओर देख रही थी| एक घंटा पुअर अहोने को आय अतः और जैसे की डॉ बत्रा को उम्मीद थी, ओम शास्त्र ने फिर से होश में आने का संकेत दिया| सेशन ख़तम हो चूका था| शाम होने वाली थी| कुछ भी योजना के अनुसार नहीं हुआ और उनके पुराने सवालो की जगह अब नए सवाल खड़े हो गए थे| इनमे से अधिकतर सवालों के जवाब उन लोगो के पास थे, जो जान-बूझकर उन्हें छुपा रहे थे|

“हमे बात करने की जरुरत है|” डॉ बत्रा ने डॉ शाइना से कहा|

“हम सबको बात करने की जरुरत है|” डॉ शाइना ने थक-हारकर कहा|

ओम शास्त्र फिर से होश में आ गया था| उसके चेहरे पर उदासी का भाव था, क्योंकि एहसास हो चूका था की उससे अपने कुछ और रहस्यो का खुलासा हो गया था|

डॉ निवासन छोटे अंतराल की घोषणा करते हुए कमरे से बहार निकल गए|

डॉ बत्रा ने डॉ शाइना को दरवाज़े के पास बुलाते हुए कहा, “आप मुझसे लॉबी के आखिर छोर पर मिलिए|”

“मुझे लगता है हम सबको मिलना चाहिए|” शाइना ने उसी आशंका से जवाब दिया|

L.S.D ने एकदम से आकर कहा, सर, “मुझे कुछ मिला है|”

“यहाँ नहीं, हमारे साथ आओ|” डॉ बत्रा यह कहते हुए उसे अपने साथ लेकर चले गए|

“मैं बाकि सबको बुलाकर लती हूँ|” डॉ शाइना ने कहा|

सभी कक्ष से बहार चले गए और वीर गॉर्डस के साथ ओम शास्त्र पर नज़र रखने अंदर आ गया|

लॉबी के आखरी छोर पर पुहंचकर प्रेम ने सबसे पहले बात शुरू करते हुए कहा, “वह अलग-अलग स…सदियों का ज़िकर नहीं क…कर रहा है| वह अलग अलग यू…यूगो की बात कर रहा है| ऐसा क…कैसे हो सकता है?”

डॉ शाइना ने कहा, “यह आदमी मेरी समझ में नहीं आता| वह कहता है की उसका नाम ओम शास्त्र है; लेकिन उसी समय रामायण का शुषेण और महाभारत का विधुर होने का भी दवा करता है, जिसका मतलब है की वह चाहता है की हम यह मान ले की उसने उम्र में भड़ाना बंद कर दिया है! इसके अतिरिक्त, वह सुभाष चंद्र बॉस को अश्वथामा मानकर उनकी खोज कर रहा है| आखिर वह है कौन?”

“सवाल यह है की वह है क्या?” डॉ बत्रा ने चिढ़कर कहा|

L.S.D “तुम्हे क्या मिला है?” उन्होंने पूछा|

“सर, बहुत से चौंका देने वाले तथ्य| मुझे ओम शास्त्र के बैंक खातों के बारे में पता चला है| उन् सब में काफी धनराशि है और वह सब देश के अलग-अलग राज्यों में है|”

“हम्म…और?” डॉ बत्रा ने पूछा|

“पहचान के तोर पर सभी खातों पर उसकी फोटो है| मैंने उसकी फोटो का इस्तेमाल उसके द्वारा बताये गए सभी नामो के विषय में जानकारी को ढूंढने के लिए किया| मुझे पता चला की प्रोत्तम दास के पास एक वेध आल इंडिया ड्राइविंग लाइसेंस है| गोविंदलाल यादव के नाम से एक मतदाता पहचान-पत्र है| बंकिमचंद्र चक्रवर्ती के नाम पर पासपोर्ट; मधुकर राओ के पास D.P.D., को कानूनी रूप से मान्यता दी गयी थी और उसकी शायरों की प्रारंभिक सार्वजनिक पेशकश जारी की गयी थी| वह वह शेयर मधुकर राओ के पिता वेंकट रमन्तं राओ द्वारा खरीदे गए थे| विकट रामणांना राओ के मौजूद खातों पर भी ओम शास्त्र की फोटो है| ओम शास्त्र की उम्र 40 साल और मधुकर राओ के पिता की मौत भी सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 40 साल की उम्र में ही हो गयी थी| मैंने उसके द्वारा बताए गए सभी नामो की पिता सम्भान्धि जानकारी को देखा है|”

“अलग-अलग नाम, एक ही चेहरा! इसका मतलब है की वह 40 से 50 साल के अंतराल के साथ पिता और पुत्र दोनों था| ऐसा उसके द्वारा लिए गए सभी नामो के मामलो में है|”

“लॉकर की बात करे तो गुरशील सिंह खुल्लर के नाम से, पंजाब में, पंजाब नेशनल बैंक का एक लॉकर है| S.P., रेड्डी हैदराबाद में आंध्र बैंक के एक लॉकर का मालिक है| गुरशील सिंह के पिता को छोड़कर किसी का कोई पुलिस रिकॉर्ड नहीं है और उनका चेहरा भी ओम शास्त्र के चेहरे से मेल खाता है| वह भारत-पाकिस्तान के बॉर्डर पर पकड़ा गया था| वह उन लोगो में से एक है, जो कभी पाकिस्तान की जेल में कैद थे| यह सभी नाम प्रतिष्ठित संस्थाओ और विश्विद्यालो से रिक्षित है| आधिरयण एक डॉ है| B.C. चर्कवर्ती ने पेरिस की यात्रा की है| लेकिन मुझे विष्णु गुप्त के बारे में कुछ नहीं पता चला और न ही चन्द्रगुप्त उसके द्वारा बताये गए नामो में से किसी से जुड़ा है| यही हाल विधुर और संजय का भी है|” L.S.D. को अपनी कला पर गर्व था|

इससे पहले की L.S.D. आगे बोल पाती, डॉ बत्रा ने विचार करते हुए पूछा, “उनकी माँ के बारे में कोई जानकारी?”

“जब वह बहुत छोटे थे, तब उनकी माताओ की मृत्यु हो गयी थी| उनकी कोई तस्वीर नहीं मिल सकी| इन सभी नामो को केवल उनके पिता ने पाला है|”

यह एक संयोग नहीं हो सकता|” डॉ शाइना ने कहा|

‘उसने कहा था की उसकी सभी पहचाने वास्तिक है|’ शाइना ने विचार किया|

“क्या तुम्हे सुभाष चंद्र बॉस और इन सभी लोगो के बीच कोई सम्बन्ध मिला?” डॉ बत्रा ने पूछा|

“थोड़ा-बहुत…जैसे की कुछ अजीब वास्तविक तथ्य, जिनका दावा कुछ लोगो द्वारा सुभाष चंद्र बॉस की जानकारी के सम्बन्ध में किया जाता है|” L.S.D. ने खुलासा किया|

“यही की उनकी एक विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी? यह स…सबको पता है|” प्रेम ने हकलाते हुए पूछा| उसकी आँखों में चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी|

“हाँ, लेकिन इसके अलावा भी मुझे एक बहुत अजीब चीज़ का पता चला है| सुभाष चंद्र बॉस की मृत्यु पांच बार, पांच अलग नामो के साथ, भारत के पांच अलग अलग शहरों में हुई है” L.S.D. ऐसे बोली, जैसे वह एक बड़े रहस्य को उजागर कर रही हो|

“क्या?” सभी एक साथ चिल्लाये|

“हम्म…यह तो होना ही था| संसार से बहार की हर वस्तु अंदर इस आदमी से जुडी हुई है|” डॉ बत्रा ने आरोप लगाते हुए कहा|

L.S.D. डॉ बटर एके मजाक पर मुस्कुराते हुए आगे बोली, “सुभाष चंद्र बॉस का जनम 23 जनवरी, 1897 को हुआ था| वह एक भारतीय राष्ट्रवादी थे, जिनकी अवज्ञा आंदोलन में देशभक्ति ने उन्हें भारत का नायक बना दिया था| लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान भारत को अंग्रेजी हुकूमत से आज़ाद करने के प्रयास में उन्होंने नाज़ी जर्मनी और साम्राज्वादी जापान से सहायता ली थी, जिसने एक उलझन भरी विरासत दी|”

“माननीय नेता जी 1920 और 1930 के दशक में इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेता जी थे और वह 1938 और 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने; लेकिन महात्मा गाँधी और कांग्रेस के उच्च अधिकारियों से मतभेद के कारण उन्हें कांग्रेस के नेतृत्व से निष्कासित कर दिया गया था| सन् 1940 में भारत से बहार जाने से पहले उन्हें अंग्रेजो द्वारा घर में नज़रबंद रखा गया था|”

“माना जाता है की सुभाष चंद्र बॉस की मृत्यु अगस्त 1945 में ताइहोकू फॉरमोसा में (जिसे अब्ब तायपेई, ताईवान कहा जाता है) एक विमान दुर्घटना में हुई थी| कई बुद्धिजीवियों की राइ में, सुभाष चंद्र बॉस की मृत्यु थर्ड डिग्री बर्न्स के कारण हुई थी लेकिन उनके कोई समर्थको ने, विशेष रूप से बंगाल में, उनकी मृत्यु के तथ्य या परिस्थितियों को मानने से इंकार कर दिया था और तब से इंकार ही करते आ रहे है| उनकी मृत्यु के कुछ घंटो बाद ही साजिश भरी कहानियां सामने आयी, जिसमे से कुछ आज भी कायम है, जिनमे बॉस से सम्बंधित कुछ भयंकर काल्पनिक बातें है| बॉस के जीवित होने की कथाएं वर्ष 1945 में ही काफी प्रचलित हो गयी थी, जब उन्हें दिल्ली में देखा गया था और माना जाता है की उन्हें लाल किले में मारा गया था| लेकिन 15 साल बाद, सन् 1960 में, पेरिस में ली गयी एक तस्वीर में उन्हें देखा गया था|”

“ओम का एक नाम बंकिमचंद्र चक्रवर्ती भी, सन् 1964 में, पेरिस सुभाष चंद्र बॉस की खोज करने के लिए गया था| सन् 1964 में 27 मई को सुभाष चंद्र बॉस को भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के अंतिम संस्कार के समय भी देखा गया था| सन् 1977 में एक बार फिर यह दावा किया गया था की वह मध्य प्रदेश के शिवपुकलम में एक संत का जीवन व्यतीत कर रहे थे और वही उनकी मृत्यु हुई और अंतिम संस्कार कर दिया गया था| इन् सभी रहस्य्मय कहानियो के बाद एक गुमनामी बाबा की कहानी ने जनम लिया| वह अपने समर्थको से पर्दे के पीछे से ही बात करते थे| उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद में गुमनामी बाबा के विश्वासपात्रों ने किसी तरह उनके, 1944 में, जर्मनी जाने का खुलासा कर दिया था; उसी साल और समय, जब सुभाष चंद्र बॉस जर्मनी में अडोल्फ हिटलर से मिले थे| उनके विश्वासपात्रों ने यह भी बताया था की वह पेरिस की सुंदरता का गुणगान करते नहीं थकते थे| ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है, जो गुमनामी बाबा के पेरिस जाने की पुष्टि कर सके; लेकिन, सुभाष चंद्र बॉस अवश्य ही वहां गए थे| गुमनामी बाबा के निजी मित्रो ने यह भी बताया था की वह जब भी अपने सुभाष चंद्र बॉस की खबर सुनते, तुरंत ही अपने रहने का स्थान बदल लेते थे|”

“माना जाता है की उन्होंने 16 सितम्बर, 1985 को अपना देह-त्याग किया था; लेकिन दिलचस्प बात इस तारीख में नहीं, बल्कि उनकी जन्मतिथि में है, जो संयोग से 23 जनवरी, 1897 है| वही दिन, जब सुभष चंद्र बॉस का जनम हुआ था| यह कहने की जरुरत नहीं है की ओम शास्त्र का विचार है की सुभाष चंद्र बॉस अभी भी जीवित है; और तो और, वह उन्हें ढूंढ रहा है|” L.S.D., को जो कुछ भी जानकर मिली थी, उसने वह सब बता दी|

कुछ पल के लिए सब शांत थे| सारे टुकड़ो को जोड़ते हुए वह समझने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कुछ भी समझ में नहीं आया| कुछ देर बाद डॉ बत्रा ने कहा, “प्रेम, उस श्लोक का क्या मतलब था?”

प्रेम ने विनम्रता के साथ हकलाते हुए जवाब दिया-

“भूड़ापा मानव को बाघ की तरह डराता है, बीमारियां शरीर पर शत्रु की तरह वार करती है जीवन फूटे मटके से पानी की तरह टपकता रहता है; फिर भी लोग दुसरो को नुक्सान पोहचाने के बारे में सोचते है; वह अपने क्षणभंगुर होने का एहसास नहीं करते, यह वास्तव में आश्चर्य का विषय है| यह उस श्लोक का सटीक अर्थ है|”

“हम में से यह कोई नहीं जनता की इस पूछताछ से हम किस दिशा में जा रहे है? लेकिन एक व्यक्ति है, जिसके पास हमारे सारे सवालो के जवाब है और समय आ गया है की हमे पता चले की हम यहाँ किस उदेश्य से आये है? मैं डॉ निवासन के पास जा रहा हूँ| या तो मैं जवाब के साथ वापिस आऊंगा या इस जगह को अभी-के-अभी छोड़कर चला जाऊंगा| क्या कोई मेरा साथ देंगे?” डॉ बत्रा ने पूछा|

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