unexpectedstories.in वहां कुछ पल की शांति के बाद प्रेम बोला, सभी फोटोज को दे… देखकर उसके दोहरे पर्सनालिटी या पुनर्जन्म की संभा… सम्भावनाये ख़तम हो जाती है| अब नई व्याख्या क्या है?”
कुछ देर शांति में गुजरने के बाद L.S.D., ने भांग करते हुए कहा, “टाइम ट्रेवल!”
वो अपने लैपटॉप को देख रही थी| उसका सारा ध्यान अपने देवीकेस पर था| अध्याय : 6
यह क्या अनाप – शनाप है! टाइम ट्रेवल एक कल्पना है| टाइम स्थैतिक नहीं है की तुम उसमे आगे या पीछे जा सको| अतीत अतीत है और भविष्य अभी तक मूर्त रूप में नहीं है|” अभी ने L.S.D., की बात की आलोचना करते हुए कहा| L.S.D., ने उसके शब्दों को अनसुना कर दिया|
डॉ बत्रा ने फिर सबको सम्बोधित करते हुए कहा, “प्रेम का कहना है की विष्णु गुप्त, जो ॐ खुद होने का दावा करता है, वह चाणक्य का दूसरा नाम है और यह भी की चंद्र गुप्त कोई और नहीं, बल्कि मौर्य साम्राज्य का चद्रगुप्त मौर्या है|”
“मैं प्रेम पर विश्वास करने के लिए मजबूर हूँ, क्योंकि बंदा सिंह बहादुर और फरुख्शियर, उसके द्वारा लिए गए नाम, सिख कथाओ का हिस्सा है| आप सभी ने कुछ समय पहले मेरी बातचीत को सुना होगा| अब मैं इस बात के बारे में आपके विचार जानना चाहता हूँ|”
डॉ। तेज, आप एक डॉक्टर है| आप इन सबमे कैसे विश्वास कर सकते है? यह बिलकुल तर्क से परे है|” शाइना गुस्से में थी|
“ठीक है, डॉ शाइना, तो प्लीज आगे बड़े और L.S.D., के साथ ढूंढे गए डाक्यूमेंट्स में एक ही फेस के इन सभी लोगो और उनके पिता को तार्किक रूप से सही ठहराइए|” डॉ बत्रा ने मुँह तोड़ जवाब देते हुए कहा| शाइना अवाक् रह गयी|
“सर,ओम शास्त्र द्वारा बोला गया श्लोक मूल रूप से चाणक्य का है|” L.S.D., अभी भी अपनी खोज में लगी हुई थी|
बंदा सिंह बहादुर कौन है और चाणक्य का अतीत क्या है?” अभी ने पूछा| इससे पहले की डॉ। बत्रा बंदा बहादुर के बारे में कुछ कह पाते, प्रेम ने हकलाते हुए जवाब दिया, लेकिन इस बार कॉन्फिडेंस के साथ| unexpectedstories.in
“माना जाता है की चाण…क्य का जनम 350 इसा पूर्व में हुआ था| लेकिन यह एक विवाद का सब्जेक्ट है और उनके जन्म के बारे में बहुत सारी कहानिया प्रचलित है| बोध ग्रंथो के अनुसार, उनका जनम-स्थान तक्षिला है| जैन शास…स्त्रो में उन्हें एक दरमिला कहा गया है, जिसका अर्थः यह है की वह दक्षिण भारत के मूल निवासी थे| एक और जैन मान्यता के अनुसार, चाण…क्य का जन्म गोला क्षेत्र के छान…के गाओं में एक भ्रामण च… नीम और उसकी पत्नी चनेश्वरी के यहाँ हुआ था| अन्य सूत्रों के अनुसार, चाणक्य उत्तर भारत में रहने वाले भ्रामण थे| वह वेदो के विधान ेव विष्णु भगवन के भक्त थे| जैन कथाओ के अनुसार, उन्होंने अपनी वृद्धावस्था में जैन धर्म अपनाया था – चन…द्रगुप्त मौर्या की तरह|” प्रेम ने वर्णन किया|
“चाण…क्य एक भारतीय शिक्षक, दर्शनीय, अर्थशास्त्री, नययज्ञ और राजकीय सलाहकार थे| उन्हें पारम्परिक रूप से कौटिल्य या विष्णु गुप्त के नाम से जाना जाता है, जिन्होंने प्राचीन भारतीय राजनीती ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ लिखा है| उन्हें भारत में राजनीती विज्ञान और अर्थशास्त्र का जनक माना जाता है और उनके काम को शास्त्रीय अर्थशास्त्र का प्रणेता माना जाता है| उनके काम गुप्त साम्राज्य के आखिरी समय में विलुप्त हो गए थे और वर्ष 1915 तक दुबारा नहीं खोजे गए थे|” सभी ने बहुत ध्यान से प्रेम का चाणक्य के बारे में उल्लेख सुना|
L.S.D., अपने लैपटॉप में से उनके बारे में और जानकारी पढ़ते हुए आगे बोली, प्रारम्भ में वह तक्षिला विश्विद्याला में शिक्षक थे| चाणक्य ने प्रथम मौर्य समर्थ चन्द्रगुप्त मौर्य की सत्ता में आने के लिए सहायता की थी| मौर्य साम्राज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए उन्हें व्यापक रूप से श्रेय दिया जाता है| चाणक्य ने दोनों समर्थ-चद्रगुप्त एवं उसके पुत्र बिन्दुसार की प्रमुख सलाहकार के रूप में सेवा की थी|”
एक किवदंती के अनुसार,चाणक्य ने वानप्रस्थ गमन किया था, जहाँ उनकी मृत्यु अन्हार के कारण हुई|”
हेमचन्द्र द्वारा लिखी गयी एक और कथा के अनुसार, चाणक्य की मृत्यु बिन्दुसार के एक मंत्री सुबंधु के षडियंत्र द्वारा हुई थी| वह चाणक्य को पसंद नहीं करता था| उसने बिन्दुसार को बताया की चाणक्य उसकी माँ की मृत्यु केजिम्मेदार थे|”
“बिन्दुसार भयभीत वह क्रोधित था और जब चाणकय को पता चला की राजा क्रोधित है, तो उन्होंने अपने जीवन का अंत करने का फैसला किया| जैन परम्पराओ के अनुसार उन्होंने अपने आप को बिना कुछ खाये-पिए भूख से मार दिया था| इसी दौरान राजा को जब पूरी बात का पता चला की चाणक्य उसकी माँ की मृत्यु के जिम्मेदार नहीं थे, की वह एक दुर्घटना थी, तब उसने सुभान्दु को चाणक्य से संथारा त्यागने हेतु मनाने के लिए कहा| इसके विपरीत, सुभान्दु ने चाणक्य के अंतिम संस्कार समारोह की योजना बनाई| वह चाणक्य को जिन्दा जलाना था| चाणक्य की मृत्यु का कोई निश्चित उल्लेख नहीं है|”
अभी बीच में बोला “इसका मतलब है की चाणक्य की मृत्यु भी अस्पष्ट है!”
चाणक्य को भारत में महान विधान के रूप में जाना जाता है| बहुत से राष्ट्रवादी उन्हें उन प्रारंभिक लोगो में गिनते है, जिन्होंने सम्पूर्ण उपमहाद्वीप की एक अविभाजित भारतवर्ष के रूप में कल्पना की थी|”
भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलहाकार शिवशंकर मेनन ने चाणक्य के ‘अर्थशास्त्र’ के स्पष्ट और सटीक नियमो की प्रशंसा की है, जो आज भी लागू होते है|” L.S.D., ने आगे बताया|
“बंदा बहादुर?” अभी ने फिरसे पूछा|
सभी ने उस सिक्ख नाम पर रौशनी डालने के लिए डॉ। बत्रा की ओर देखा| डॉ बत्रा ने कहा, “बंदा बहादुर का जन्म सं 1670 में ‘लक्समन देव’ नाम से हुआ था और बाद में वह एक सिक्ख सेनापति बन गए थे| 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने संत बनने के लिए घर छोड़ दिया और उन्हें ‘माधो दास’ नाम दिया गया था|”
“उन्होंने गोदावरी नदी के तट पर नांदेड़ में एक मैथ की स्थापना की थी| सं 1708 में गुरु गोविन्द सिंह से उनकी भेंट हुई थी और वह उनके शिष्य बन गए थे, जिन्होंने उन्हें एक नया नाम दिया- ‘बंदा सिंह बहादुर’| गुरु गोविन्द सिंह के आशीर्वाद एवं अधिकार से उन्होंने योद्धाओ की फ़ौज बनायीं और मुगल बादशाह के विरुद्ध संघर्ष छेड़ दिया| पंजाब में अपनी सत्ता स्थापित करने के बाद बंदा सिंह बहादुर ने जमींदारी प्रथा को समाप्त किया और जमीन के मालिक को संपत्ति के अधिकार दिए| सं 1715 में बंदा सिंह बहादुर को गुरदास नांगल किले से पकड़कर लोहे के एक पिंजरे में बंद कर दिया था| उनकी टुकड़ी के बाकि सिक्खो को भी पकड़ लिया गया था| सभी सिक्खो को एक जुलूस में दिल्ली लाया गया, जिसमे 780 सिक्ख कैदी थे, 2,000 के सर भालो से लटकाये गए थे और जनता में खौफ पैदा करने के लिए काट दिए गए सिक्खो के सर से भरी हुई 700 गाड़ियां थी| उन्हें दिल्ली के किले में रखा था, जहाँ उन पर अपना धरम छोड़ने और इस्लाम अपनाने के लिए दबाव दाल गया था| उनके मना करने पर उन सभी को फांसी की सजा सुना दी गयी थी| प्रतिदिन 100 सिक्खो को किले से बहार लाया जाता था और उनकी सार्वजानिक हत्या कर दी जाती थी| यह सिलसिला करीब 7 दिनों तक चला| मुग़ल अपनी प्रसन्नता रोक नहीं पा रहे थे; लेकिन सिक्खो ने हताश या निराशा का कोई भाव नहीं दिखाया, बल्कि वह अपने भजन गाते रहे; न ही कोई मौत से डरा और न ही किसी ने अपने धर्म को छोड़ा| बंदा सिंह बहादुर की फांसी से पहले सरदारों को उनके सामने प्रताड़ित किया जाता था| उनके सर को भालो से घोपा गया और बंदा सिंह बहादुर, जो जमीन पर उकडू बैठे थे, उनके चारो और एक चक्र में लगाया गया, फिर उन्हें एक छोटी तलवार दी गयी और अपने ही बेटे अजय सिंह को मारने का आदेश दिया गया| वह स्थिर बैठे हुए थे| उसी समय जल्लाद आगे बड़े और छोटे बेटे को अपनी तलवार से मारते हुए उसके शरीर के दो हिस्से कर दिए| फिर शरीर के मांस के टुकड़े काटकर बंदा के चेहरे पर फेके गए|” उसके जिगर को शरीर से निकाल कर बंदा सिंह बहादुर के मुँह में ठूसा गया| पिता बिना किसी भावना के ऐसे ही बैठे रहा| उनके धैर्य की परीक्षा अभी और भी ली जानी थी| जल्लाद आगे बढ़ा और अपने खंजर के नुकीले हिस्से को बंदा सिंह बहादुर की सीधी आँख में डालकर उनकी पुतली को निकाला और फिर दूसरी पुतली को| बंदा इस सब के दौरान पत्थर की तरह स्थिर बैठे हुए थे| उनके चेहरे पर दर्द का कोई नामोनिशान नहीं था| उस हैवान ने फिर अपनी तलवार ली और बंदा के उलटे पैर और दोनों हाथो को काट दिया; परन्तु बंदा का प्रत्येक अंग फिर भी ऐसे स्थिर रहा, जैसे उनके जन्मदाता ने उन्हें शांति प्रदान कर दी हो और अंत में, उसने उनके मांस को लाल गर्म चिमटे से खींच दिया और जब उनके अत्याचारों में अब कुछ भी नहीं बचा तो उनके शरीर को सैकड़ों टुकड़ो में काटकर वह संतुष्ट हो गए|”
L.S.D., अपना सर लैपटॉप में गड़ाए बैठी रही और उससे लगातार क्लिक और स्क्रॉल करती रही|
चाणक्य और बंदा बहादुर के जीवनकाल के बीच बड़ा अंतराल है| चाणक्य का जन्म 350 इसा पूर्व में हुआ था, जबकि बंदा सिंह बहादुर सं 1675 में इतिहास के इसी डोर से सम्भंदित है|” L.S.D., ने अपनी आँखें स्क्रीन पर गड़ाए हुए कहा|
“लेकिन ओम शास्त्र ने कहा था की उसने उन् दोनों के सलहाकार के रूप में काम किया है| लगभग 2,000 वर्षो का अंतर| क्या बकवास है!” डॉ शाइना ने उखड़ते हुए कहा|
“मैं कहूंगा की वह विभिन्न युगो के बारे में बात कर रहा है| उसने कही पर गवल्गन के बेटे संजय और हस्तिनापुर के मंत्री विधुर का भी नाम लिया था|” अभी अपने स्वाभाविक गर्व के साथ बोले|
योग! अभी हमारी भाषा में बात करो|” L.S.D., ने व्यंग्यात्मक तरीके से जवाब दिया|
“प्रिय, इसे समझ पाना तुम्हारे लिए असंभव है|” और भी व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ अभी ने फिर कहा|
“फिर भी, तुम्हे हमे समझाना चाहिए|” डॉ शाइना बीच में बोली| डॉ शाइना और L.S.D., अभी के बोलने का इंतज़ार करते हुए उसे देख रहे थे|
“हिन्दू पुराणों के अनुसार, समय को चार युगो में विभाजित किया गया है-सतयुग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलयुग|”
शाइना ने धीरे-धीरे समझते हुए सर हिलाया, “यदि यह कोई सिद्धांत है तो इनमे से प्रत्येक युग में लगभग कितने वर्ष होते है?”
अभी ने एक पेन और पेपर उठाया और शाइना के प्रश्नो का उत्तर देते हुए लिखना शुरू किया- श्रीमद्भगवद्गीता, जो युगो का वर्णन करने वाला सबसे पहला ग्रन्थ है, उसके अनुसार सतयुग की आयु देवताओ के 4,800 वर्ष के बराबर है; त्रेता युग 3,600 साल के बराबर है; द्वापर युग 2,400 साल के बराबर और कलयुग देवताओ के 1,200 साल के बराबर है| एक देवता वर्ष मनुष्यो के 360 वर्ष के बराबर है और यह च्स्सर युग 4:3:2:1 के अनुपात में है|”
“कलयुग के पूर्ण होने की अवधि आज से 42,700 वर्ष है, जिसका अर्थ यह है की कलयुग के अभी तक केवल 5,000 वर्ष व्यतीत हुए है|”
“बुरी ताक़तों को नष्ट करने लिए, धरम की पुनर्स्थापना करने के लिए और जन्म व मृत्यु के चक्कर से भक्तो को मुक्त करने के लिए भगवान विष्णु समय समय पर अवतार लेते है और ऊपर वर्णित 4:3:2:1 का समयानुपत भी विष्णु के दस अवतारों को इंगित करता है, जिसे ‘दशावतार’ नाम से भी जाना जाता है|”
“विष्णु के पहले चार अवतार सतयुग में प्रकट हुए थे, उसके बाद त्रेता में तीन अवतार हुए द्वापर में दो और दसवा अवतार कलयुग नामक वर्तमान युग में प्रकट होगा| कलयुग ‘कल्कि अवतार’ के प्रकट होने के साथ ख़तम होगा, ऐसा वर्णित है, जिसके द्वारा दुष्टो का अंत होगा, सदाचारियों को मुक्ति मिलेगी और जो एक नए सतयुग की शुरुआत करेगा| मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में भगवान विष्णु की साधना आत्मानुभूति का साधन थी| इस युग के दौरान अधिकतर लोग अच्छाई के प्रतीक थे| त्रेता युग में मनुष्य ने, अपने ज्ञान और शक्ति को सार्वभौमिक आकर्षण के गुणों से ऊपर उठाया, जो की सकारात्मक, नकारात्मक और तटस्थ उर्जाओ तथा सर्जनात्मक आकर्षण व विकर्षण के दो ध्रुवो का स्त्रोत है| इस युग में लोग धर्म और जीवन के नैतिक तरीको का पालन करते थे; हालाँकि, सतयुग की तुलना में इस युग में ईश्वरीय गुणों में एक चौथाई की कमी थी| भगवान श्रीराम, रामायण के प्रमुख पत्र, इस युग में रहते थे| द्वापर युग में मंदिरो में भवन की पूजा अर्चना करना आत्मनुभूति का साधन था| इस काल तक ईश्वरीय गुण 50 प्रतिशत काम हो गए थे| हम कलयुग में रहते है, ऐसे संसार में, जो अशुद्धता और बुराई से भरा हुआ है| प्रसन्नचित गुण रखने वाले लोग दिन-पर-दिन काम होते जा रहे है| बाद, भुकमरी, लड़ाई, अपराध, छलावा और कपट इस युग को दर्शाते है| लेकिन ग्रंथो का कहना है की अंतिम मुक्ति इस युग में ही प्राप्त की जा सकती है| यह भविषयवानी की गयी है की कलयुग के अंत में भगवान शिव भ्रमान का अंत कर देंगे और सभी मूर्त पदार्थ एक विशाल परिवर्तन से गुजरेंगे| इस तरह के विघटन के बाद भगवान भ्रमा विश्व का फिर से निर्माण करेंगे और मानव जाती एक बार फिर ‘सत्य का प्रतीक’ बन जाएगी|”
“तुम इन युगो के बीच का अंतर कुछ शब्दों में कैसे कर सकते हो?” शाइना ने पूछा|
“सतयुग में संघर्ष दो लोको के बीच था-देवलोक और असुर लोक| असुर लोक, दुष्ट के कारण, एक अलग ही लोक था|”
“त्रेता युग में लड़ाई राम और रावण के बीच थी| भगवान और राक्षस दोनों दो अलग राज्यों से राज करते थे, लेकिन एक ही लोक में पहुँच गए थे|”
“द्वापर युग में युद्ध पांडव और कौरवो के बीच था| वह युग था, जिसमे अच्छाई व बुराई एक ही परिवार में थी और वही उसके बीच संघर्ष था| हर एक गुजरते युग के साथ बुराई नजदीक आती गयी- पहले एक ही दुनिया में, फिर एक ही राज्य में और फिर एक ही परिवार में|”
“जानते हो, अब कलयुग में बुराई कहा है? वह हमारे अंदर है| अच्छाई व बुराई दोनों हमारे ही अंदर रहते है| किसकी विजय होगी? कोण दूसरे और हावी होगा, हमारे भीतर की अच्छाई या बुराई?”
शाइना ने उसे देखा| वह विचलित हो गयी|
“Kya mujhe koi batayega ki yaha chal kya raha hai or aakhir hum kis par kya kaam kar rahe hai? Aap sabhi ka dimag kharab ho gaya hai| Ye chije…ye sab aasambhav hai or poranik kathao me tathyamak vastviktao ka koi aadhar nahi hai|” Dr. Shaina ne garajte hue kaha|
“क्या मुझे कोई बताएगा कि यहाँ चल क्या रहा है और आखिर हम किस पर क्या काम कर रहे है? आप सभी का दिमाग खराब हो या है| यह चीज़े …. यह असंभव है और पौराणिक कथाओ में तथ्यात्मक वास्तविकाओ का आधार नहीं है|” डॉ शाइना ने गरजते हुए कहा|
कौन कहता है ऐसा?” अभी ने पूछा|
विज्ञान! विज्ञान कहता है! अगर आप लोगो की कहानियां पूरी हो गयी हो तो क्या अब हम असली काम पर वापस आ सकते है?” शाइना के इस तरह फात पढ़ने के बाद कमरे में सन्नाटा चा गया, जब तक अभी शाइना के एकदम विपरीत नहीं बोला|
“यह सब केवल कहानियां नहीं, बल्कि हमारी विरासत है| यह हमारा अतीत है और भाग्यवंश या दुर्भाग्य से यह सच भी है| क्या आपको लगता है की विज्ञान से ऊपर कुछ भी नहीं है? मुझे आपसे एक सवाल पूछना है| बताइये, आपके विज्ञान ने सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी की खोज कब की थी?”
शाइना हक्की-बक्की रह गयी, क्योंकि उनके पास इसका उत्तर नहीं था|
दूसरी ओर, L.S.D.’ ने बड़ी तेजी के साथ अपनी खोज दक्षता का प्रदर्शन दिया| गूगल पर कुछ क्लिक करते ही उसने गर्व के साथ कहा, “सत्रहवीं शताब्दी! जियोवानी कासिनी और जिन रिचर्ड ने सूर्य पृथ्वी की दूरी का पता लगाया था- 140 लाख किलोमीटर, अभी के आधारिक आंकड़े से केवल 9 लाख किलोमीटर दूर|”
अभी ने कहा, हनुमान चालीसा में एक पंक्ति है-युग शस्त्र योजन पर भानु, लील्यो ताहि मधुर फल जानू|” उसने मार्कर उठाया और सफ़ेद रंग के बोर्ड पर कुछ लिखने लगा|
यहाँ एक युग 12,000 साल के बराबर है| वैसे ही 1 शस्त्र = 1,000 और 1 योजन = 8 मिले”
युग क्ष शस्त्र क्ष योजन = पर भानु, जिसका मतलब है- 12,000 क्ष 1,000 क्ष 8 मिले यानि की 9,60,00,000 मिले| मैं आपको यह भी बता दू की 1 मिले = 1.6 किलोमीटर और 9,60,00,000 X 1.63 किलोमीटर, जो की लगभग 15.3 करोड़ किलोमीटर सूर्य से दूर है| उसके हाथो ने उसकी गणना को बोर्ड पर प्रदर्शित कर दिया|
सब हैरान खड़े एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे| डॉ बत्रा वापस अपनी कुर्सी की ओर बढे| अभी सफ़ेद बोर्ड पर लिखने में व्यस्त था| डॉ बत्रा के बैठने के बाद अभी ने आगे कहा, “केवल इतना ही नहीं, भरमान ग्रहो और अन्य घटनाओ के वेदो में विस्तृत वर्णन उस समय के लोगो विशाल ज्ञान को प्रदर्शित करता है, जो आधुनिक सभ्यता के अस्तित्व में आने से पहले ही मौजूद थे| एक वैदिक विशेषज्ञ सायं ने अनुवाद अनुसार, सम्मान सहित मैं उस सूर्य को नमन करता हूँ, जो आधे निमेष में 2,202 योजन की यात्रा करता है|’ अब मैं फिर से आपको कुछ घटनाएं दिखता हूँ|” उसने सफ़ेद बोर्ड की ओर संकेत करते हुए कहा|
1 योजन लगभग 9 मिले के बराबर है और एक निमेष 1 सेकंड का 16/75 भाग है| ांतेश 2,202 योजन क्ष 9 मिले क्ष 75/8 निमेष 1,85,794 मिले प्रति सेकंड के बराबर है, जो उल्लेखनीय रूप से वास्तविक मूल्य 1,86,282.397 मिले प्रति सेकंड के बराबर है| वास्तव में, रिशिवेद 5.40.5 में एक श्लोक है, जिसके अर्थ अनुसार, हे सूर्य! जब तुम अवरुद्ध हो जाते हो उसके द्वारा, जो तुम्हारे ही प्रकाश से प्रकाशित है (चन्द्रमा), तब पृथ्वी पर अचानक अन्धकार हो जाता है|”
ये सूर्य ग्रहण का एकदम सटीक वर्णन है|” उसने मार्कर मेज पर रखते हुए एक गहरी सास छोड़ी, जैसे किसी ने उसके कंधो पर से बोझ उतार दिया हो|
हर कोई बहुत ध्यान से सुन रहा था और अभी अपने ज्ञान का प्रदर्शन कर रहा था, “क्या आप उन दो भाइयों को जानते है, जिन्होंने हवाई जहाज का अविष्कार किया था?”
“राइट भाइयों!” L.S.D., ने तुरंत जवाब दिया|
अभी ने सहमति से सिर हिलाया| उसने कहा, “राइट भाइयों ने हवाई जहाज का अविष्कार उन्नीसवीं शताब्दी में किया था; हालाँकि, हमारी पौराणिक कथाओ में सदियों पहले ही उसका विवरण, यंत्रकी और सञ्चालन का वर्णन किया गया है, जिन्हे हम विमान कहते थे| वास्तव में, रामायण में पुष्पक विमान का भी वर्णन है| ‘महाभारत’ के द्रोणपुर्व के अनुसार, विमान का उल्लेख एक ऐसी गोलाकार आकृति के रूप में है, जो परे से उत्सृजित तीव्रतम आयु वेग के सहारे तेज गति से चल सकता है|”
वैमानिक शास्त्र में महर्षि भरदेज ने विमान का वर्णन किया है, जो हमारे वर्तमान पीढ़ी के विमानों की तुलना में बहुत अधिक उन्नत है|”
अभी के समझाने के तरीके से कमरे में हर कोई रोमांचित हो उठा था| शाइना हालाँकि अभी भी प्रभावित नहीं थी| उन्होंने बिना किसी शर्म के मुस्कुराते हुए पूछा, “कब तक मुझे यह बकवास सहनी होगी?” कमरे में सन्नाटा छह गया|
प्रेम उन्हें घूरते हुए बोला। “यह बकवास नहीं है| मुझे विज्ञान पर सदेह नहीं है; लेकिन आपको भी इस बात से सहमत होना होगा की हमारे शास्त्रों मे सदियों पहले से ही ऐसा बहुत कुछ है, जो विज्ञानं के लिए अकल्पनीय था| आप डॉक्टर है न? मुझे यकीन है की आप ‘सुक्षुत संहिता’ के बारे में जानती होगी|” उसने शाइना से पूछा और उन्होंने सहमति में सिर्र हिलाया|
L.S.D., ने तुरंत कुछ टाइप करते हुए जवाब दिया, हाँ मुझे भी पता है| यह शल्य चिकित्सा विज्ञानं पर सबसे पुरानी, अच्छी और उत्कृष्ट टिप्पणियों में से एक है| सुश्रुत द्वारा लिखा गया यह दुनिया में सबसे पहला चिकित्सा विश्कॉश है| सुश्रुत के प्राचीन भारतीय शलय चिकिसक थे, जिन्हे ‘शल्य’ चिकित्सा के संस्थापक ‘जनक’ के रूप में जाना जाता है| वह मूल रूप से वाराणसी में सक्रिय दक्षिण भारत के एक चिकित्सक थे| उनके नाम का सर्वप्रथम उल्लेख बजबूर अभिलेखों में है (चार से पांच शताब्दी), जहां शुक्षुग के नाम की गणना हिमालय में रहने वाले दस सदुओ में की गयी है|”
“भारतीय ग्रंथो में यह भी लिखा हुआ है की उन्होंने चिकित्सा के देवता धन्वंतरि से वाराणसी में शल्य चिकित्सा का ज्ञान सीखा था|”
अभी आत्मविश्वास से भरा महसूस कर रहा था, क्योंकि अब उसके पास एक समर्थक था| उसने डॉ। बत्रा की ओर द्देखा, जो बहुत ध्यान से सब सुन रहे थे| जहाँ शाइना को अभी भी संदेह था, वही L.S.D., इस बेहेस का आनंद ले रही थी| डॉ बत्रा अपनी कुर्सी से खड़े हुए और सबको देखते हुए कुछ देर बाद बोले, भले ही मुझे पौराणिक कथाओ के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन हम इस तथ्य की उपेक्षा नहीं कर सकते की चिकित्सक पद्धतियां विज्ञान और आधुनिक चिकित्सक के आने से बहुत पहले ही शुरू हो गयी थी| यह एक वैज्ञानिक पत्रिका में घोषणा की गयी थी की जीवित मनुष्य के दन्त के बेधन का प्रथम ेव प्रचीनतगाम प्रमाण मेहरगढ़ में पाया गया था| 7,500 से 9,000 वर्ष पूर्व मेहरगढ़ में एक कब्रिस्तान में नो व्यसक व्यक्तियों की 11 डाढो में बेधन के प्रमाण मिले है| अस्थि शल्य तकनीक और उपकरण मौजूद थे| वास्तव में आयुर्वेद में जड़ी बूटियों द्वारा मूर्छित करने की दवाइयां बनायीं जाती थी|”
दूसरी ओर, डॉ निवासन अपने फ़ोन पर बात करते हुए अपने ऑफिस में बैठे हुए थे| वह जिस व्यक्ति से बात कर रहे थे, उसे सर कहकर सम्बोधित कर रहे थे| उन्होंने ‘सर’ को प्रयोगशाला और अन्य सभी सदस्यों की सुरक्षा का आश्वासन दिया| फिर उन्होंने समझाया की टीम के अन्य सदस्यों के सुझाव पर ध्यान देना क्यों महत्वपूर्ण है! अंत में, उन्होंने कहा, “थैंक्यू सर!” और फ़ोन रख दिया|
अगला सेशन फिरफ शुरू हुआ|
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